""
Kidney Ki Samasya Ka Ayurvedic Upchar
Google Add as a preferred
source on Google
Posted on October 30, 2026 by Dr. Divyadeep

सुबह उठते ही चेहरे पर हल्की सूजन दिखना, शाम तक पैरों में भारीपन रहना और पेशाब में झाग आना, इन संकेतों को ज़्यादातर लोग थकान या आमतौर पर चल रहे मौसम का असर समझकर टाल देते हैं। जबकि हमारी दोनों किडनियाँ हर दिन खून को साफ़ करती हैं, अतिरिक्त पानी बाहर निकालती हैं और शरीर में नमक व खनिजों का संतुलन बनाए रखती हैं। इनकी कार्यक्षमता घटने पर पूरे शरीर पर खराब असर पड़ता है।

परेशानी यह है कि किडनी की समस्या शुरुआती दिनों में अक्सर कोई स्पष्ट संकेत देती ही नहीं। कई लोग रिपोर्ट में बदलाव आने तक खुद को पूरी तरह स्वस्थ मानते रहते हैं। इसलिए सही जानकारी और समय पर जाँच सबसे पहली ज़रूरत है।

तो किडनी की समस्या का आयुर्वेदिक उपचार किन सिद्धांतों पर आधारित है, और इस दौरान किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? इस ब्लॉग में आपको कारण, लक्षण, जाँच, आयुर्वेदिक दृष्टिकोण, और रोज़मर्रा की आदतों की सरल जानकारी मिलेगी।

Table of Contents

भारत में किडनी की बीमारी क्यों चिंता का विषय है?

भारत में क्रॉनिक किडनी डिजीज (CKD) के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। 2011 से 2023 के बीच हुए समुदाय-आधारित अध्ययनों की एक समीक्षा में, देश में CKD का अनुमानित संयुक्त प्रसार 13.24 प्रतिशत बताया गया है।

और इसके पीछे सबसे बड़े कारण डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर बताए गए हैं। NIDDK की CKD गाइड भी इन दोनों को प्रमुख कारण बताती है।

हमारे चिकित्सकों के अनुभव में भी कई मरीज़ तब पहुँचते हैं, जब किसी दूसरी वजह से कराई गई जाँच में क्रिएटिनिन बढ़ा हुआ मिलता है। तब तक उन्हें कोई शिकायत या समस्या महसूस ही नहीं होती।

किडनी से जुड़ी कोई परेशानी है या रिपोर्ट में बदलाव दिखा है? अपनी मेडिकल रिपोर्ट के साथ के विशेषज्ञों से परामर्श लें।

आज ही अपना अपॉइंटमेंट बुक करें!

क्या आप जानते हैं? आँकड़ों में किडनी की स्थिति

ऊपर दिए गए उसी समीक्षा के अनुसार भारत में CKD की औसत दर 13.24% है, लेकिन क्षेत्र के हिसाब से यह उत्तर भारत में 7.2% से लेकर मध्य भारत में 16.74% तक पहुँचती है। यानी इलाके, जलवायु और जीवनशैली के साथ पूरी की पूरी तस्वीर ही बदल जाती है।

किडनी की समस्या क्या है और यह शरीर को कैसे प्रभावित करती है?

किडनी खून से अनावश्यक पदार्थों को फ़िल्टर करती है और शरीर में पानी व खनिजों का संतुलन बनाए रखती है। इसके अलावा ब्लड प्रेशर के नियंत्रण में भी उसकी अहम भूमिका होती है। इनमें से कोई भी काम बिगड़ने पर शरीर में तरल जमा होने लगता है और थकान बढ़ जाती है।

किडनी की बीमारी के मुख्य प्रकार कौन-से हैं?

किडनी की परेशानी कई रूपों में सामने आती है। CKD वह स्थिति है जो लंबे समय में धीरे-धीरे बढ़ती है, और AKI वह जिसमें कुछ ही दिनों के भीतर किडनी का काम अचानक बिगड़ जाता है।

पथरी या पेशाब का रास्ता रुकने पर भी किडनी पर दबाव पड़ता है। इन सबका इलाज एक-सा नहीं होता, इसलिए डॉक्टर जाँच करके पहले यह तय करते हैं कि मरीज़ को किस प्रकार की समस्या है।

किडनी की समस्या के कारण क्या हैं?

किडनी पर असर डालने वाली वजहें कई हैं, पर रोज़मर्रा के मरीज़ों में कुछ ही बार-बार दिखती हैं। किडनी की समस्या के कारण समझ में आ जाएँ, तो बचाव का रास्ता भी आसान हो जाता है।

Kidney Ki Samasya Ke Karan Kya Hain

  • डायबिटीज इनमें सबसे आगे है। ब्लड शुगर सालों तक काबू में न रहे, तो वह किडनी के बारीक फ़िल्टरों को धीरे-धीरे नुकसान पहुँचाती है।
  • हाई ब्लड प्रेशर भी किडनी को कमज़ोर करता है। लगातार ऊँचा दबाव किडनी की रक्त वाहिकाओं पर चोट करता रहता है।
  • उल्टी, दस्त या तेज़ बुखार में शरीर का पानी तेज़ी से घट जाता है। तब किडनी को अचानक ज़्यादा मेहनत करनी पड़ती है।
  • कई लोग कमर या जोड़ों के दर्द में डॉक्टर से पूछे बिना दर्द की गोलियाँ खाते रहते हैं। यह आदत लंबे समय तक चले, तो किडनी पर बोझ बढ़ाती है।
  • परिवार में किसी को किडनी रोग रहा हो, तो आपको जाँच जल्दी शुरू करनी चाहिए। पथरी या किसी दूसरी रुकावट के कारण पेशाब का बहाव थमता हो, तब भी डॉक्टर को ज़रूर दिखाएँ।

किडनी की बीमारी के लक्षण जिन्हें नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए

किडनी की बीमारी के लक्षण हर व्यक्ति में अलग तरह से दिखाई देते हैं। इन संकेतों पर ध्यान दें:

  • पैरों, टखनों या चेहरे पर सूजन
  • पेशाब में झाग आना या उसके रंग में बदलाव
  • सामान्य से ज़्यादा थकान
  • भूख कम लगना, जी मिचलाना या उल्टी
  • पेशाब की मात्रा या बार-बार पेशाब जाने की आदत में बदलाव
  • सांस लेने में परेशानी, खासकर जब शरीर में अतिरिक्त तरल जमा हो

क्या किडनी की बीमारी बिना लक्षणों के भी हो सकती है?

हाँ, CKD के शुरुआती चरणों में कई लोगों को कोई स्पष्ट परेशानी महसूस नहीं होती। इसलिए केवल लक्षणों के आधार पर किडनी की सेहत का अनुमान लगाना सही नहीं है। NIDDK भी जोखिम वाले लोगों को नियमित जाँच की सलाह देता है।

किडनी की समस्या होने पर कौन-सी जाँचें जरूरी हो सकती हैं?

डॉक्टर आम तौर पर कुछ बुनियादी जाँचों से शुरुआत करते हैं। आगे का किडनी रोग का उपचार इन्हीं रिपोर्टों के आधार पर ही आमतौर पर तय होता है।

Serum Creatinine और eGFR टेस्ट

क्रिएटिनिन मांसपेशियों से बनने वाला अपशिष्ट (waste) है, जिसे किडनी खून से फ़िल्टर करती है। इसके स्तर से डॉक्टर eGFR निकालते हैं, जो किडनी की फ़िल्टर करने की क्षमता का अनुमान देता है। एक रिपोर्ट से पूरी बात पता नहीं चलती। इसलिए डॉक्टर उसे पिछली रिपोर्टों और आपकी मौजूदा स्थिति के साथ मिलाकर समझते हैं।

Urine Albumin और UACR टेस्ट

पेशाब में एल्ब्यूमिन यानी प्रोटीन का आना किडनी के फ़िल्टर पर असर का संकेत हो सकता है। UACR जाँच इस समस्या को शुरुआती चरण में पकड़ने में मदद करती है।

ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर और अन्य जाँचें

ज़रूरत पड़ने पर डॉक्टर ब्लड शुगर, ब्लड प्रेशर, इलेक्ट्रोलाइट्स और अल्ट्रासाउंड की सलाह भी देते हैं। इन जाँचों का विस्तृत ब्योरा NIDDK की जाँच गाइड में मिलता है।

आधुनिक उपचार की सीमाएँ क्या हैं?

आधुनिक चिकित्सा कई बार जान बचाती है, और इसे नकारा नहीं जा सकता। लेकिन किडनी रोग में हर इलाज की कुछ कीमत भी होती है, जिसे मरीज़ को पहले से जान लेना चाहिए।

दवाओं और गोलियों के साइड इफ़ेक्ट

कमर, घुटने या जोड़ों के दर्द में कई लोग महीनों तक दर्द की गोलियाँ खाते रहते हैं। ये NSAID श्रेणी की दवाएँ किडनी में खून का बहाव घटा सकती हैं।

National Kidney Foundation के अनुसार हर साल क्रॉनिक किडनी फेलियर के 3 से 5 प्रतिशत नए मामले दर्द की दवाओं के ज़्यादा इस्तेमाल से जुड़े हो सकते हैं।

डायलिसिस के बाद मरीज़ को क्या-क्या झेलना पड़ता है?

डायलिसिस ज़िंदगी बचाने वाला इलाज है, पर इसके बाद कई मरीज़ों को चक्कर आते हैं और ब्लड प्रेशर गिर जाता है। पैरों में ऐंठन, उल्टी जैसा मन, त्वचा में खुजली और संक्रमण का जोखिम भी रहता है। इनका ब्योरा DaVita की गाइड में मिलता है।

हीमोडायलिसिस करा रहे 70 मरीज़ों पर हुए एक अध्ययन में लगभग 76 प्रतिशत को मांसपेशियों की ऐंठन और 34 प्रतिशत को ब्लड प्रेशर की गिरावट झेलनी पड़ी।

ट्रांसप्लांट और सर्जरी के बाद की दूसरी बीमारियाँ

ट्रांसप्लांट के बाद शरीर नई किडनी को ठुकराए नहीं, इसके लिए मरीज़ को लंबे समय तक इम्यूनोसप्रेसेंट दवाएँ खानी पड़ती हैं। BAUS की मरीज़ गाइड के अनुसार ये दवाएँ ज़िंदगी भर चलती हैं, और इनके अपने कई साइड इफ़ेक्ट हैं।

Kidney Care UK बताती है कि इन दवाओं से संक्रमण और कैंसर का खतरा बढ़ता है। ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल और डायबिटीज़ जैसी नई परेशानियाँ भी खड़ी हो सकती हैं।

सर्जरी अपने आप में एक जोखिम है, क्योंकि अस्पताल में संक्रमण होने की आशंका रहती है। BAUS के ही अनुसार लगभग आधे ट्रांसप्लांट 10 साल बाद भी ठीक चल रहे होते हैं। बाकी में मरीज़ को दोबारा डायलिसिस पर लौटना पड़ सकता है।

इसीलिए बीमारी के शुरुआती चरण में ही हर विकल्प को समझ लेना बेहतर है। इसी मोड़ पर अनुभवी आयुर्वेदिक चिकित्सक से सलाह लेकर देखभाल की योजना बनाई जा सकती है, ताकि आगे के कठिन फ़ैसले टल सकें।

किडनी की समस्या का आयुर्वेदिक उपचार क्या है?

किडनी की समस्या का आयुर्वेदिक उपचार आधुनिक जाँचों का विकल्प नहीं है। यह एक पूरक दृष्टिकोण है, जिसमें आहार, दिनचर्या और व्यक्ति की प्रकृति और बीमारी की जड़ पर काम किया जाए इस पर ध्यान दिया जाता है।

आयुर्वेद में किडनी की सेहत को कैसे देखा जाता है?

आयुर्वेद में किडनी को ‘वृक्क’ कहा जाता है और उसे ‘मूत्रवह स्रोत’ से जोड़कर देखा जाता है। वात, पित्त और कफ के संतुलन को इस दृष्टिकोण का आधार माना जाता है।

आयुर्वेदिक देखभाल में क्या शामिल हो सकता है?

किडनी की बीमारी का आयुर्वेदिक इलाज किसी एक दवा पर टिका नहीं होता। चिकित्सक पहले मरीज़ की रिपोर्ट देखते हैं, फिर उसके पोषण की ज़रूरत के हिसाब से भोजन तय करते हैं।

इसके बाद नींद, हल्की शारीरिक गतिविधि और रोज़ की आदतों पर बात होती है। औषधियाँ तभी शुरू होती हैं, जब योग्य चिकित्सक रिपोर्ट की समीक्षा कर लेते हैं। पंचकर्म भी हर मरीज़ को नहीं मिलता। विशेषज्ञ जाँच करके तय करते हैं कि यह किसके लिए उपयुक्त है। क्या आयुर्वेदिक देखभाल आपकी स्थिति में उपयुक्त है? अपनी रिपोर्ट के साथ विशेषज्ञ से चर्चा करें और विकल्प समझें।

आज ही कॉल करें और हमारे विशेषज्ञों से सलाह लें

Jeena Sikho HiiMS Agra में किडनी की देखभाल का तरीका

किडनी की बीमारी में एक रिपोर्ट देखकर घबरा जाना या कोई एक तय इलाज शुरू कर देना सही नहीं है। Jeena Sikho HiiMS Agra के इंटीग्रेटेड हॉस्पिटल में डॉक्टर मरीज़ की रिपोर्ट, लक्षण, खानपान और दिनचर्या को साथ रखकर देखभाल की योजना बनाते हैं। किडनी के रोग का आयुर्वेदिक उपचार यहाँ इन्हीं चरणों में आगे बढ़ता है।

1. सबसे पहले पूरी तस्वीर को समझना

सबसे पहले मरीज़ की पुरानी मेडिकल फाइलें, चल रही दवाएँ, ब्लड शुगर, ब्लड प्रेशर, eGFR और UACR रिपोर्ट एक साथ देखी जाती हैं। इससे समझ आता है कि समस्या कितनी पुरानी है और किन कारणों से बढ़ी होगी। इसी जानकारी के आधार पर आगे की योजना बनती है।

2. आहार और जीवनशैली पर व्यक्तिगत ध्यान

हर मरीज़ की शारीरिक क्षमता और रिपोर्ट अलग होती है। इसलिए भोजन की योजना भी उसी के अनुसार तैयार की जाती है, ताकि किडनी पर अनावश्यक दबाव न पड़े।

नींद, चलने-फिरने की आदत और भोजन के समय पर भी बात की जाती है। कई बार यही छोटे बदलाव सबसे ज़्यादा काम आते हैं।

3. GRAD System

CKD के मरीज़ों के लिए HiiMS में GRAD System का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें तीन हिस्से शामिल हैं। यह सहायक देखभाल का एक तरीका है, जिसे जाँच के बाद ही हर मरीज़ पर लागू किया जाता है।

  • Head-Down Tilt Therapy (HDT): इस थेरेपी में मरीज़ को 5 से 15 डिग्री के कोण पर झुके हुए बिस्तर पर इस तरह लिटाया जाता है कि सिर और धड़ पैरों से थोड़े नीचे रहें। पूरी प्रक्रिया के दौरान प्रशिक्षित स्टाफ मरीज़ पर नज़र रखता है। यह थेरेपी हर किसी के लिए उपयुक्त नहीं होती, इसलिए पहले चिकित्सक जाँच करते हैं।
  • Hot Water Immersion (HWI): इसमें मरीज़ को 40 से 42 डिग्री सेल्सियस के गुनगुने गर्म पानी के टब में 15 से 45 मिनट तक बैठाया जाता है। इससे शरीर को आराम मिलता है और पसीना आता है। और किडनी एक तरीके से तीसरी किडनी की तरह काम करती है। यह मरीज़ के लिए सुरक्षित है या नहीं, इसका निर्णय हृदय की स्थिति और ब्लड प्रेशर देखकर ही होता है।
  • pH-बैलेंस्ड DIP Diet: यह पौधों पर आधारित आहार है। इसमें सुबह ताज़े फल, दोपहर और रात के भोजन से पहले कच्ची सब्ज़ियों का सलाद और सूर्यास्त से पहले हल्का, आसानी से पचने वाला भोजन शामिल रहता है। इसकी मात्रा और विकल्प मरीज़ की रिपोर्ट व पोषण की ज़रूरत देखकर चिकित्सक तय करते हैं।

4. पंचकर्म और विशेष आयुर्वेदिक थेरेपी

मरीज़ की स्थिति के अनुसार स्नेहन, स्वेदन, वमन, विरेचन और बस्ती जैसी पंचकर्म प्रक्रियाएँ शामिल की जाती हैं। ये शरीर की शुद्धि की पारंपरिक विधियाँ हैं। किडनी रोग में हर प्रक्रिया हर मरीज़ के लिए ठीक नहीं होती, इसलिए इनका चुनाव जाँच के बाद ही किया जाता है।

5. नियमित निगरानी और फॉलो-अप

उपचार के दौरान ज़रूरी जाँचें समय-समय पर दोबारा कराई जाती हैं। इनसे पता चलता है कि देखभाल का मरीज़ पर क्या असर हो रहा है और योजना में क्या बदलाव चाहिए।

लक्षणों, ब्लड प्रेशर और ब्लड शुगर की भी लगातार निगरानी की जाती है। इसी से किडनी की समस्या का आयुर्वेदिक उपचार की आगे की दिशा तय होती है।

किडनी की समस्या में आयुर्वेद पर रिसर्च क्या कहती है?

2024 में International Journal of AYUSH में एक केस रिपोर्ट प्रकाशित हुई। इसमें CKD और हाई ब्लड प्रेशर वाले 81 वर्षीय पुरुष की सात दिन की देखभाल दर्ज है।

रिपोर्ट के अनुसार ब्लड प्रेशर 162/100 से घटकर 130/70 हो गया। सीरम क्रिएटिनिन 2.27 से 2.14 mg/dl और यूरिक एसिड 9.58 से 6.21 mg/dl पर आया।

किडनी की सेहत कैसे सुधारें? रोज़मर्रा की आदतों पर ध्यान दें

किडनी की सेहत कैसे सुधारें, इसका जवाब काफ़ी हद तक रोज़ की छोटी आदतों में मिलता है।

किडनी के अनुकूल आहार कैसे चुनें?

नमक और अत्यधिक प्रोसेस्ड भोजन को सीमित रखें। CKD में पोटैशियम, फॉस्फोरस और प्रोटीन की मात्रा रिपोर्ट के अनुसार तय कराएँ।

ब्लड शुगर और ब्लड प्रेशर पर नज़र रखें

नियमित जाँच कराएँ और निर्धारित दवाएँ सही समय पर लें। डॉक्टर के साथ फॉलो-अप न छोड़ें।

बिना सलाह के दवाएँ न लें

कुछ दर्द निवारक दवाएँ किडनी को नुकसान पहुँचा सकते हैं या दूसरी दवाओं के असर को बदल सकते हैं।

नियमित जाँच क्यों ज़रूरी है?

डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर या किडनी रोग के पारिवारिक इतिहास वाले लोगों को डॉक्टर की सलाह के अनुसार समय-समय पर जाँच करानी चाहिए।

निष्कर्ष

किडनी की बीमारी में सबसे बड़ा बचाव समय पर इसकी पहचान करना ही है। लक्षण दिखने का इंतज़ार न करें, क्योंकि शुरुआती चरण में किडनी अक्सर कोई लक्षण नहीं दिखाती है। ब्लड शुगर और ब्लड प्रेशर पर नज़र रखें और नियमित जाँच कराएँ, क्योंकि जाँच बदलावों को समय रहते पकड़ लेती है। 

किडनी की समस्या का आयुर्वेदिक उपचार चुनने से पहले अपनी रिपोर्ट, मौजूदा स्वास्थ्य और उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाणों को साथ रखें। नियमित फॉलो-अप आगे की सही योजना बनाने में आपकी मदद करता है। अपनी स्थिति के हिसाब से व्यक्तिगत सलाह चाहिए, तो Jeena Sikho HiiMS के विशेषज्ञ डॉक्टरों से VOPD परामर्श लें। 

VOPD Consultation 51

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

1. किडनी की समस्या में आयुर्वेदिक देखभाल पर कब विचार करना चाहिए?
शुरुआती चरण में ही किसी अनुभवी आयुर्वेदिक चिकित्सक से सलाह लेना एक अच्छा कदम है, क्योंकि आयुर्वेद शरीर को प्राकृतिक तरीके से सहारा देने पर ध्यान देता है। रिपोर्ट देखकर ही चिकित्सक बताते हैं कि आपके लिए कौन-सी देखभाल उपयुक्त है।

2. किडनी की बीमारी में कौन-सी जाँचें ज़रूरी होती हैं?
आम तौर पर Serum Creatinine, eGFR और Urine Albumin या UACR जाँच कराई जाती है। ज़रूरत पड़ने पर डॉक्टर अन्य जाँचें भी सुझा सकते हैं।

3. आयुर्वेदिक देखभाल के दौरान किडनी की जाँच कितने अंतराल पर करानी चाहिए?
यह अंतराल मरीज़ की स्थिति और बीमारी की गंभीरता पर निर्भर करता है। चिकित्सक रिपोर्ट देखकर बताते हैं कि अगली जाँच कब करानी है।

4. किडनी की सेहत के लिए खानपान में क्या बदलाव करने चाहिए?
संतुलित आहार लें और नमक की मात्रा पर ध्यान दें। पानी और अन्य पोषक तत्वों की मात्रा डॉक्टर की सलाह से रिपोर्ट के अनुसार तय करें।

5. किडनी की समस्या में डॉक्टर से कब संपर्क करना चाहिए?
पेशाब कम होने, नई सूजन, पेशाब में खून या लगातार असामान्य लक्षण दिखने पर जल्द सलाह लें। सांस में गंभीर परेशानी या पेशाब अचानक बहुत कम होने पर तुरंत चिकित्सा सहायता लें।

Dr. Divyadeep
Author: Dr. Divyadeep

Dr. Divyadeep is a qualified Ayurvedic physician with BAMS and NDDY qualifications and 15 years of experience. She specialises in Ayurvedic care for kidney health and is committed to providing thoughtful, personalised guidance. Her approach focuses on understanding each patient’s needs and supporting better kidney health through Ayurveda and holistic care.

Disclaimer: The information provided on this blog is for general educational and informational purposes only. It is not intended to replace professional medical advice, diagnosis, or treatment. Always consult a qualified healthcare professional before making any changes to your diet, lifestyle, or treatment plan. Individual results may vary.

Scroll to Top