पाइल्स, यानी बवासीर, एक बेहद आम समस्या है, लेकिन शर्म या झिझक की वजह से लोग इसकी चर्चा नहीं करते। अच्छी खबर यह है कि अगर समय पर ध्यान दिया जाए, तो इसे संभालना काफी आसान हो जाता है। पहला कदम है यह जानना कि बवासीर क्यों होती है और शरीर किन संकेतों से इसकी खबर देता है।
एक भारतीय स्टडी, जो मैंगलोर के दो बड़े अस्पतालों में की गई, उसमें बवासीर के 220 मरीजों के रिकॉर्ड देखे गए । करीब 80% मरीजों में सबसे आम लक्षण मल के साथ खून आना था, जबकि 68% में बार-बार भारी वज़न उठाने की आदत देखी गई। आगे इस ब्लॉग में बवासीर के कारण, लक्षण, मेडिकल इलाज और आयुर्वेदिक इलाज के बारे में सरल भाषा में बताया गया है।
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बवासीर क्या है?
गुदा (anus) के अंदर खून की नसों के छोटे गद्दे होते हैं, जिन्हें anal cushions कहा जाता है। मल पर नियंत्रण रखने में ये मदद करते हैं। पर इन नसों पर लगातार दबाव बना रहे, तो ये सूजकर फूल जाती हैं। यही स्थिति बवासीर कहलाती है।
बवासीर के दो प्रकार होते हैं:
- अंदरूनी बवासीर: गुदा के भीतर बनती है, इसमें अक्सर दर्द नहीं होता, पर खून आ सकता है।
- बाहरी बवासीर: गुदा के बाहर की त्वचा के नीचे बनती है, और इसमें सूजन, दर्द व बैठने में परेशानी ज़्यादा होती है।
अंदरूनी बवासीर को डॉक्टर 4 ग्रेड में बाँटते हैं:
- ग्रेड 1: मस्सा अंदर रहता है, खून आ सकता है और दर्द आमतौर पर नहीं होता।
- ग्रेड 2: जोर लगाने पर मस्सा बाहर निकलता है, फिर खुद वापस अंदर चला जाता है।
- ग्रेड 3: मस्सा बाहर निकलता है और उसे हाथ से धकेलकर अंदर करना पड़ता है।
- ग्रेड 4: मस्सा बाहर ही रहता है और अंदर नहीं जा पाता।
बवासीर को समझ लेने के बाद अगला कदम इसके कारण जानना है, क्योंकि कारण पता हो तो बचाव आसान होता है।
बवासीर क्यों होती है? जानें इसके प्रमुख कारण
गुदा की नसों पर लगातार बना रहने वाला दबाव ही बवासीर की जड़ है, और यह दबाव अक्सर हमारी रोज़ की आदतों से पैदा होता है। इसलिए एक-एक कारण को समझना जरूरी है।
1. कब्ज़ और मल त्याग के समय ज़ोर लगाना
जामनगर की एक आयुर्वेदिक स्टडी में 61 मरीजों में से करीब 70% को कब्ज़ की आदत थी। यही वजह है कि कब्ज़ को बवासीर का सबसे बड़ा कारण माना जाता है। सख्त मल निकालने के लिए ज़ोर लगाना पड़ता है, जिससे पेट के अंदर दबाव बढ़ता है और गुदा की नसें फूलने लगती हैं।
2. डाइट में फाइबर और पानी की कमी
मैदा, जंक फूड और तली हुई चीज़ों में फाइबर बहुत कम होता है और ये पचने में भी भारी होते हैं। इनके साथ पानी कम पिया जाए, तो मल सूखा और सख्त हो जाता है। इससे फिर कब्ज़ और ज़ोर लगाने की नौबत आती है।
3. लंबे समय तक बैठना या खड़े रहना
ऑफिस में घंटों बैठे रहने से गुदा पर लगातार दबाव पड़ता है। जामनगर स्टडी में सबसे बड़ा समूह (करीब 43%) बैठकर काम करने वाले मरीजों का था। लंबे समय तक खड़े रहने से भी नसों में खून जमने लगता है।
4. बार-बार भारी वज़न उठाना
भारी चीज़ें उठाते समय हम बिना ध्यान दिए साँस रोक लेते हैं और ज़ोर लगाते हैं। कब्ज़ में मल त्याग के समय भी ठीक ऐसा ही दबाव बनता है। इसलिए मज़दूरी या जिम में भारी वज़न उठाने वालों को खतरा ज़्यादा रहता है।
5. टॉयलेट में देर तक बैठे रहना
टॉयलेट में फोन चलाते हुए 10-15 मिनट बीत जाना आम बात है। इस पोज़िशन में गुदा की नसों पर दबाव लगातार बना रहता है। इसलिए कोशिश करें कि मल त्याग जल्दी पूरा हो जाए।
6. प्रेग्नेंसी, बढ़ती उम्र और मोटापा
प्रेग्नेंसी में बढ़ता गर्भाशय पेल्विक नसों को दबाता है, और हार्मोन बदलने से कब्ज़ भी आम हो जाती है। बढ़ती उम्र में नसों को सहारा देने वाले टिश्यू कमज़ोर होते हैं। वहीं पेट पर ज़्यादा चर्बी नसों पर दबाव और बढ़ाती है।
कारण समझने के बाद अगला कदम है लक्षणों को सही समय पर पहचानना, क्योंकि समय पर ध्यान देने से बवासीर को संभालना आसान हो जाता है।
बवासीर के लक्षण कैसे पहचानें?

बवासीर के लक्षण धीमी रफ्तार से बढ़ते हैं, इसलिए शुरुआत में इन्हें मामूली समझकर अनदेखा कर दिया जाता है। फिर भी इन संकेतों पर ध्यान देना ज़रूरी है,
- चमकीला लाल खून: मल के साथ चमकीले लाल रंग का खून आना बवासीर का सबसे आम संकेत है। यह अक्सर टॉयलेट पेपर या पॉट में दिखता है। अंदरूनी बवासीर में इसके साथ दर्द आमतौर पर नहीं होता।
- गाँठ या मस्सा: बाहरी बवासीर में गुदा के किनारे एक नरम गाँठ का एहसास होता है। कई बार अंदरूनी मस्सा भी मल त्याग के समय बाहर आ जाता है।
- खुजली और जलन: सूजी नसों के आसपास की त्वचा पर म्यूकस लगने से खुजली शुरू होती है, और बार-बार पोंछने पर जलन बढ़ सकती है।
- दर्द और बैठने में तकलीफ: अगर बाहरी बवासीर में खून का थक्का बन जाए, तो दर्द तेज़ होता है और ठीक से बैठना मुश्किल हो जाता है।
- पेट पूरी तरह खाली न होने की अनुभूति: मल त्याग के बाद भी लगता है कि कुछ बचा हुआ है। गुदा के भीतर का सूजा हुआ मस्सा इसकी वजह बन सकता है।
लक्षणों को पहचान लेने के बाद ज़्यादातर लोग सोचने लगते हैं कि इलाज क्या हो। तो सबसे पहले मेडिकल साइंस के विकल्प देखते हैं।
बवासीर का मेडिकल इलाज और उसकी सीमाएं
बवासीर की शुरुआत में डॉक्टर सबसे पहले खानपान और दवाओं पर जोर देते हैं। फाइबर वाली डाइट, मल नरम करने वाली दवाएं और क्रीम दी जाती हैं। साथ ही गुनगुने पानी में बैठने (सिट्ज़ बाथ) को कहा जाता है, जिससे दर्द और सूजन कुछ कम हो जाती है।
जब मस्सा बढ़ जाए, तो रबर बैंड लिगेशन, स्क्लेरोथेरेपी या इन्फ्रारेड कोएगुलेशन जैसे प्रोसीजर की जरूरत पड़ती है। स्थिति गंभीर हो, तो हेमोरॉइडेक्टॉमी, स्टेपलर या लेज़र सर्जरी का रास्ता अपनाया जाता है।
पर इन सबके साथ कुछ दिक्कतें भी जुड़ी हैं। क्रीम और दवाओं से मिलने वाला आराम अक्सर थोड़े समय का होता है। सर्जरी के बाद दर्द, ठीक होने में लगने वाला समय और खर्च कई लोगों को परेशान करते हैं। और सबसे अहम बात, अगर कब्ज़ और आदतें नहीं बदलीं, तो बवासीर दोबारा हो सकती है।
इसीलिए कई लोग ऐसा इलाज ढूँढते हैं जो पाचन और जीवनशैली को भी ठीक करे। आयुर्वेद अपनी बात यहीं से शुरू करता है।
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आयुर्वेद में बवासीर का इलाज: अर्श को जड़ से समझना
आयुर्वेद में बवासीर को अर्श कहा जाता है। इसे ऐसा रोग माना गया है जो दुश्मन की तरह गुद्दे के रास्ते में रुकावट और पीड़ा पैदा करता है। आचार्य सुश्रुत ने इसे आठ कठिन रोगों की श्रेणी यानी अष्ट महागद में रखा है।
आयुर्वेद के अनुसार, बवासीर से जुड़ी समस्याओं को इन बिंदुओं से समझा जा सकता है:
- पाचन अग्नि: पाचन शक्ति कमजोर होने से भोजन ठीक से नहीं पचता और कब्ज की समस्या हो सकती है।
- वात दोष: आयुर्वेद में वात दोष के असंतुलन को बवासीर से जुड़ी समस्याओं का एक कारण माना गया है।
- सूखी बवासीर: इसे शुष्क अर्श कहा जाता है। आयुर्वेद में इसका संबंध वात और कफ दोष से बताया गया है।
- खूनी बवासीर: इसे रक्तार्श कहा जाता है। आयुर्वेद में इसका संबंध पित्त और रक्त के असंतुलन से जोड़ा जाता है।
सुश्रुत संहिता में अर्श के लिए चार चिकित्सा पद्धतियों का वर्णन मिलता है:
- भेषज: औषधियों द्वारा देखभाल।
- क्षार कर्म: विशेष क्षारीय पदार्थों का चिकित्सकीय उपयोग।
- अग्नि कर्म: नियंत्रित ताप द्वारा की जाने वाली प्रक्रिया।
- शस्त्र कर्म: आवश्यकता के अनुसार शल्य चिकित्सा।
कौन सी पद्धति उपयुक्त है, यह बवासीर की स्थिति, गंभीरता और रोगी की सेहत पर निर्भर करता है।
भेषज चिकित्सा: पाचन सुधारने वाली औषधियां
शुरुआती बवासीर में त्रिफला, हरीतकी, अभयारिष्ट और त्रिफला गुग्गुलु जैसी औषधियाँ परंपरागत रूप से दी जाती हैं। मल को नरम रखने और पाचन बेहतर करने में ये सहायक मानी जाती हैं। खूनी बवासीर पर की गई एक क्लिनिकल स्टडी में त्रिफला गुग्गुलु से 6 हफ्ते तक इलाज हुआ और लक्षणों पर अच्छा असर मिला। शोधकर्ताओं के अनुसार त्रिफला मल त्याग आसान बनाकर कब्ज़ से राहत दिलाता है।
क्षारसूत्र: आयुर्वेद की पैरा-सर्जिकल तकनीक

बड़े मस्सों में क्षारसूत्र अपनाया जाता है। यह औषधीय धागा है, जिस पर अपामार्ग क्षार, स्नुही और हल्दी की परतें लगाई जाती हैं। मस्से की जड़ पर इसे बाँध दिया जाता है, और कुछ दिनों में मस्सा धीरे-धीरे सूखकर गिर जाता है।
जामनगर की स्टडी में 35 मरीजों को क्षारसूत्र से और 26 को सर्जरी से ठीक करने की कोशिश की गई। क्षारसूत्र वाले समूह को अस्पताल में कम दिन रुकना पड़ा, ऑपरेशन के दौरान या बाद में ब्लीडिंग नहीं हुई, और गुदा सिकुड़ने की समस्या भी नहीं मिली। इस प्रोसीजर को केवल प्रशिक्षित शल्य तंत्र विशेषज्ञ ही जाँच के बाद करते हैं।
Jeena Sikho HiiMS में बवासीर की आयुर्वेदिक देखभाल

Jeena Sikho HiiMS का तरीका आयुर्वेद की उसी सोच पर टिका है कि सबसे पहले पाचन ठीक किया जाए। HiiMS एक इंटीग्रेटेड हॉस्पिटल है, जहाँ आयुर्वेद, नेचुरोपैथी और मॉडर्न मेडिकल साइंस एक साथ काम करते हैं। यहाँ बवासीर को केवल मस्से की समस्या नहीं, बल्कि पूरे पाचन तंत्र की गड़बड़ी के रूप में देखा जाता है।
pH-बैलेंस्ड डाइट
मरीज को ताज़ा, सादा और प्लांट-बेस्ड खाना दिया जाता है। इसमें फाइबर भरपूर होता है, जबकि प्रोसेस्ड फूड बहुत कम। इससे मल नरम रहता है और ज़ोर लगाने की ज़रूरत कम पड़ती है। डाइट हर मरीज की ज़रूरत के हिसाब से तय होती है।
हर्बल सपोर्ट
अर्श में त्रिफला, हरीतकी, नागकेसर और कुटज जैसी जड़ी-बूटियाँ पारंपरिक रूप से इस्तेमाल की जाती हैं। पेट साफ रखने में त्रिफला और हरीतकी मदद करती हैं। नागकेसर और कुटज खूनी बवासीर में राहत देने के लिए जानी जाती हैं। इन्हें सिर्फ डॉक्टर की निगरानी में दिया जाता है।
पंचकर्म
आयुर्वेद में बिगड़े वात को शांत करने के लिए बस्ति को विशेष माना गया है। ज़रूरत के हिसाब से विरेचन भी किया जा सकता है। कौन-सा प्रोसीजर उचित है, इसका निर्णय डॉक्टर मरीज की जाँच के बाद लेते हैं।
योग, प्राणायाम और दिनचर्या
पवनमुक्तासन, मलासन और भोजन के बाद वज्रासन पाचन को सहारा देते हैं। अनुलोम-विलोम जैसे प्राणायाम तनाव कम करने में मदद करते हैं। इसके अलावा समय पर सोने और रोज़ एक तय समय पर मल त्याग की आदत बनाने पर ज़ोर रहता है।
हर इलाज योजना डॉक्टर की जाँच के बाद बनाई जाती है और परिणाम हर व्यक्ति में अलग-अलग हो सकते हैं। ज़्यादा ब्लीडिंग या चौथे ग्रेड की बवासीर में सर्जन की राय भी ज़रूरी है। चल रही दवाएँ डॉक्टर से पूछे बिना बंद न करें।
Jeena Sikho HiiMS में बवासीर की आयुर्वेदिक देखभाल और उपलब्ध उपचार विकल्पों के बारे में अधिक जानकारी के लिए आज ही संपर्क करें।
बवासीर से बचाव के आसान उपाय और डॉक्टर से कब मिलें
बवासीर का इलाज कराने के बाद भी रोज़ की आदतें तय करती हैं कि परेशानी लौटेगी या नहीं। इन बातों का ध्यान रखें:
- भरपूर पानी पिएं: दिन भर में 8-10 गिलास पानी मल को सख्त होने से बचाता है। सुबह उठकर गुनगुना पानी लेना भी फायदेमंद है।
- खाने में फाइबर बढ़ाएं: थाली में हरी सब्ज़ियां, फल, दलिया और साबुत अनाज रखें। मैदा और तला-भुना कम खाएं।
- बैठे न रहें: हर घंटे उठकर 2-3 मिनट टहल लें, खासकर अगर आपकी डेस्क जॉब है।
- टॉयलेट में जल्दबाज़ी या देर, दोनों से बचें: मोबाइल बाहर रखें, 5 मिनट से ज़्यादा न लगाएं और पैरों के नीचे स्टूल रखें।
- इन संकेतों पर देर न करें: ज़्यादा खून आना, काला मल, बेवजह वज़न गिरना, या 40 के बाद मल त्याग में अचानक बदलाव। ये दूसरी गंभीर समस्याओं की ओर भी इशारा कर सकते हैं, इसलिए जांच ज़रूर कराएं।
इन आदतों को रोज़ की दिनचर्या बनाने से बवासीर के दोबारा लौटने का खतरा काफ़ी घट जाता है, लेकिन ऊपर बता ए गए चेतावनी संकेत दिखें तो डॉक्टर से जांच कराने में देर न करें।
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निष्कर्ष
बवासीर शर्म की नहीं, समय पर ध्यान देने की बात है। गुदा की नसों पर बना दबाव ही इसकी जड़ है, और यह दबाव कब्ज़, फाइबर और पानी की कमी, घंटों बैठे रहने और टॉयलेट की गलत आदतों से बढ़ता है। मल के साथ खून, गाँठ, खुजली या बैठने में तकलीफ़ जैसे संकेत दिखें तो उन्हें टालें नहीं। इलाज चाहे मेडिकल हो या आयुर्वेदिक, डॉक्टर की जाँच के बाद ही चुनें। और इलाज के बाद भी पानी, फाइबर और रोज़ की सही आदतें बनाए रखें, ताकि परेशानी दोबारा न लौटे।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. क्या बवासीर अपने आप ठीक हो सकती है?
शुरुआती बवासीर में खानपान और आदतें सुधारने से अक्सर काफ़ी राहत मिल जाती है। पर अगर लक्षण बार-बार लौटें, तो डॉक्टर से जाँच ज़रूर कराएं।
2. बवासीर में क्या खाना चाहिए?
हरी सब्ज़ियां, फल, दलिया, साबुत अनाज और भरपूर पानी लें। मैदा, तली चीज़ें और ज़्यादा मिर्च-मसाले कम करने से आराम मिलता है।
3. क्या बवासीर में खून आना खतरनाक है?
थोड़ा चमकीला लाल खून बवासीर में आम है। लेकिन खून ज़्यादा आए, मल काला दिखे या कमज़ोरी लगे, तो तुरंत डॉक्टर को दिखाएं।
4. क्षारसूत्र क्या है?
यह जड़ी-बूटियों के क्षार से बना औषधीय धागा है, जिसे मस्से की जड़ पर बांधा जाता है। यह प्रक्रिया केवल प्रशिक्षित आयुर्वेदिक सर्जन जाँच के बाद ही करते हैं।
5. Jeena Sikho HiiMS में बवासीर के लिए सलाह कैसे लें?
आप अपने नज़दीकी HiiMS सेंटर के OPD में डॉक्टर से मिल सकते हैं। घर बैठे सलाह के लिए VOPD (वीडियो कंसल्टेशन) भी बुक कर सकते हैं।
Disclaimer: The information provided on this blog is for general educational and informational purposes only. It is not intended to replace professional medical advice, diagnosis, or treatment. Always consult a qualified healthcare professional before making any changes to your diet, lifestyle, or treatment plan. Individual results may vary.





